अमेरिकी बिल के मुताबिक, इन देशों से आने वाले सामान पर 100% तक टैरिफ लगाया जा सकेगा। साथ ही रूस की ऊर्जा, वित्तीय और रक्षा व्यवस्था पर भी नए प्रतिबंध लगाने का प्रावधान है। इससे पहले बिल के शुरुआती मसौदे में 500% टैरिफ लगाने का प्रस्ताव था, लेकिन बाद में इसे घटाकर 100% कर दिया गया।
अगर यह बिल पास हो जाता है, तो अमेरिका पहली बार किसी देश पर सिर्फ इसलिए टैरिफ लगाएगा, क्योंकि वह रूस से तेल खरीदकर उसकी कमाई बढ़ा रहा है। इस कदम का मकसद रूस के तेल कारोबार पर आर्थिक दबाव बनाना और उसकी युद्ध लड़ने की क्षमता कमजोर करना है।
भारत ने पिछले महीने आधे से ज्यादा तेल रूस से खरीदा :-
भारत ने जून 2026 में रूस से रिकॉर्ड 26.1 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल खरीदा, जो देश के कुल तेल आयात का 52.4% था। यानी पिछले महीने भारत में आयात होने वाले हर दो बैरल तेल में एक से ज्यादा बैरल रूस से आया रूस लगातार भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर बना हुआ है। मई के मुकाबले जून में रूस से तेल आयात में करीब 39% की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
यूरोपीय देशों को टैरिफ में राहत देगा अमेरिका :-
सीनेट में पेश बिल के तहत 15 यूरोपीय देशों को प्रस्तावित 100% टैरिफ से छूट दी गई है। इन देशों को राहत इसलिए दी गई है, क्योंकि ये रूस से 15% से कम प्राकृतिक गैस खरीदते हैं और धीरे-धीरे उस पर अपनी निर्भरता भी कम कर रहे हैं। डेमोक्रेट सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने कहा कि यह बिल यूरोपीय सहयोगियों के खिलाफ नहीं है। इसका निशाना सिर्फ वे देश हैं, जो अब भी रूस के तेल कारोबार को सबसे ज्यादा आर्थिक सहारा दे रहे हैं। बिल में रूस के ऊर्जा उद्योग, वित्तीय संस्थानों, रक्षा औद्योगिक ढांचे, कारोबारियों और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन तक पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव है।
रूस पर सख्ती वाले बिल को दोनों दलों का समर्थन :-
सीनेट में पेश रूस-विरोधी टैरिफ बिल को रिपब्लिकन और डेमोक्रेट, दोनों दलों का समर्थन मिला है। इसे अमेरिकी राजनीति में 'बाइपार्टिसन बिल' कहा जाता है। यानी ऐसा प्रस्ताव जिस पर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों सहमत हों।आमतौर पर अमेरिका में कई बड़े विधेयक राजनीतिक मतभेदों की वजह से अटक जाते हैं। लेकिन जब दोनों दल किसी बिल के साथ खड़े होते हैं, तो उसके कांग्रेस से पारित होने की संभावना काफी बढ़ जाती है।बिल को कानून बनने के लिए अभी सीनेट और प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) दोनों से मंजूरी लेनी होगी। इसके बाद राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होने पर ही यह कानून बनेगा।
अमेरिका, रूस पर इतना सख्त क्यों:-
1. यूक्रेन युद्ध की फंडिंग रोकना- अमेरिका का मानना है कि रूस को तेल-गैस बेचकर मिलने वाली कमाई यूक्रेन युद्ध का सबसे बड़ा आर्थिक आधार है। इसलिए सबसे पहले उसी आय पर चोट करने की कोशिश है।
2. रूस का सबसे बड़ा हथियार है तेल-गैस- रूस के बजट और विदेशी मुद्रा का बड़ा हिस्सा ऊर्जा निर्यात से आता है। इसी वजह से नया बिल तेल, गैस, बैंक और ऊर्जा परियोजनाओं को एक साथ निशाना बनाता है।
3. रूस का तेल खरीदने वालों पर भी दबाव- अमेरिका चाहता है कि भारत, चीन जैसे बड़े खरीदार रूसी तेल खरीद कम करें, ताकि मॉस्को की कमाई घटे और उस पर बातचीत का दबाव बढ़े।
4. पुतिन को बातचीत की मेज पर लाना- बिल के समर्थकों का कहना है कि आर्थिक दबाव बढ़ाकर रूस को यूक्रेन के साथ शांति वार्ता के लिए मजबूर किया जा सकता है।

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